कालिदास ऑडिटोरियम में दूसरे दिन सुर, ताल और स्वर की अनोखी संगति

पटियाला। नॉर्थ जोन कल्चरल सेंटर के कालिदास ऑडिटोरियम में चल रहे पटियाला संगीत समारोह के दूसरे दिन शास्त्रीय संगीत का अनुपम संगम देखने को मिला। वायलिन, तबला और स्वर—इन तीनों की संयुक्त प्रस्तुति ने श्रोताओं को देर तक मंत्रमुग्ध रखा।
 
कौशर हाजी और स्वरंगी मराठे की सुरमयी शुरुआत
शाम का आरंभ गायिका कौशर हाजी और स्वरंगी मराठे के आलाप से हुआ। जयपुर-अतरौली घराने की ख़ूबसूरती—गंभीर आलाप, ठहराव और तानों की उड़ान—कौशर हाजी के गायन में स्पष्ट झलकी। स्वरंगी मराठे ने पं. राम मराठे की शैली की छाप लिए अपने भावपूर्ण गायन से माहौल में विशिष्ट रंग भरे , एक भजन… हरी रंग लाग ,और फिर द्रुत एकताल में भवरा सतावेरी,खड़ी अटरिया बाट तकत हूँ पियाकी …..  फिर राग भीमपलास में रे बिरहा,बमना सगुन बीचारों…  पर दर्शकों की तालियाँ लगातार लय में बजती ही रहीं । 
 
उस्ताद असगर हुसैन के वायलिन ने रचा भावलोक
इसके बाद मंच संभाला वायलिन वादक उस्ताद असगर हुसैन ने। उनके मींड, आलाप और शांत, ध्यानमग्न व्याख्या ने सभागार में एक पारदर्शी, उजली लय बिखेर दी। उनकी प्रस्तुति पूरी समूह-संगति की भावभूमि बनकर उभरी।
 
उस्ताद अकर म खान की तबले की थाप ने बढ़ाई रौनक
अज्राड़ा घराने के प्रतिनिधि उस्ताद अकर्म खान ने अपनी सधी हुई तबला संगत से वायलिन और गायन दोनों को ऊर्जस्वित बनाया। तेज और विलंबित लयों पर समान पकड़ ने दर्शकों को विशेष रूप से प्रभावित किया।
 
सामूहिक प्रस्तुति बनी समारोह की खास याद
चारों कलाकारों की संयुक्त प्रस्तुति में परंपरा और प्रयोगशीलता का सुंदर संतुलन दिखाई दिया। सुर, वायलिन और तबले का तानाबाना ऐसा बुना गया कि पूरा सभागार संगीत को केवल सुन ही नहीं रहा था, बल्कि महसूस भी कर रहा था। प्रस्तुति समाप्त होने के बाद भी तालियों की गूंज देर तक ऑडिटोरियम में बनी रही।
 
पटियाला संगीत समारोह का दूसरा दिन इस बात का प्रतीक रहा कि विविध घरानों के कलाकार जब एक मंच पर एक-दूसरे के पूरक बनकर प्रस्तुत होते हैं, तो संगीत एक अनुभव बन जाता है।
 
तीसरे दिन क्या रहेगा खास 
 
कुछ ना हो …..  जैसे हिट गीत में बाँसुरी बजाने वाले प्रसिद्ध बाँसुरी वादक पंडित रोनू मजुमदार अपनी पेशकारी देंगे ; रोनू मजुमदार 1942    ए लव   स्टोरी के सुपरहिट गीत कुछ न कहो , ज़मीन आसमान केगीत ऐसा समाँ  ना होता और माचिसफ़िल्म केगीत पानी पानीरे में अपनी बाँसुरी का प्रदर्शन कर चुके हैं।
 

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